वैलेंटाइन डे, मजनूं और समस्याएं
रोंम में जन्मे सेंट वैलेटाइन को प्यार के दुश्मनों ने 14 फरवरी को मौंत के घाट उतार दिया था । उन पर आरोप था कि उन्होने प्यार करने वालों का साथ दिया था । तभी से प्यार करने वाले अपने अपने रब को इसी दिन याद करते हैं । लेकिन हम तो पश्चिम से बहुत आगे हैं। ईसा पूर्व के पहले से ही हम न केवल एक दिन बल्कि पूरे मौंसम को ही प्यार का मौसम मानते हैं । पश्चिम तो सिर्फ एक दिन 14 फरवरी को जानता है लेकिन हम तो पूरे वसंत ऋतु को ही । जब सर्दी का मौसम अपनी केंचुली छोड़ गर्मी के मौसम में प्रवेश करता है उसे वसंत ऋतु कहते है । इस समय में पेड़ पौधे भी अपने साल भर के प्यार( पत्तों ) को त्याग कर अपने प्यार को तरो ताजा करते हैँ लेकिन आप अपने प्यार को त्यागें मत, लेकिन समीक्षा जरुर करें । हमारे लोक संगीत और हिन्दी फिल्मो में भी इस एक महीने वाले वैलेंटाइन ड़े के बारे में खूब सारी बातें कही गयी हैं ।
पूरे साल वैलेंटाइन डे मनाने वाले को प्रेमी कहते है लेकिन एक दिन के लिए अपना वैलेंटाइन ढूंढ़ने वालो को मजनूं कहा जाता है । वैसे मजनूं तो लैला के आशिक का नाम था और जो सिर्फ लैला को ही देखता था । समय बदला और मजनूं की परिभाषा भी बदली.........., छेड़ना, कमेंट करना और जवानी की मस्ती के नाम पर की गयी बाते आज के मजनुंओ की पहचान है । ये मजनूं केवल वैलेंटाइन ड़े की समस्या नहीं हैं, यह हर रोज की समस्या है और जिससे हमारे देश की आधी जनसंख्या (महिलाओ) को रोज किसी ना किसी रुप में दो चार होना पड़ता है ।
मजनुंओ की संख्या कालेज और विश्वविघालयों तक पहुंचते पहुंचते अपनी चरम सीमा पर होती है । शिक्षण संस्थाओं में दुनिया भर की प्रेम कहानियो( रोमियो- जूलिएट) को पढ़ने वाले छात्र बाहर आते ही अपने तरीके से उसकी व्याख्या करने लगते हैं । रोमियो- जूलिएट के अलावा हमारे मजनुंओ को मजनूं गिरी का ज्ञान हिन्दी फिल्मों के हीरो से भी खूब मिलता है। फिल्मो में हीरो अपनी हीरोइन को प्रभावित( पटाने) करने के लिए छेड़छाड करता है, बदमाशो को पीटता है और अन्त में दोनो के बीच प्यार हो जाता है थ्रियेटर के बाहर निकलते ही लड़के वही छेड़छा़ड सड़कों पर करता हैं और मजनूं कहलाते है ।
मजनुंओ को बल हमारे समाज से ही मिलता है और उनको बढाबा देने वाले हम आप ही है। जब एक लड़का किसी लड़की से मिलता जुलता है तो उसे हमारा समाज शाहिद कपूर और शाहरुख खान कह कर उसकी हौसला अफजायी करता है । वही लड़कियां जरा सी भी अपनी बातो को खुल कर बताने की कोशिश करती है तो उसे बदचलन और न जाने कैसी कैसी उपमाओं से सजाया जाता है । हमारे घरो में अगर लड़का बड़ा होता है और इधर इधर की बातें करता है मम्मी पापा उसे फ्रैंक ब्वाय कहते हैं लेकिन लड़कियां करे तो ठीक से रहो , ठीक तरिके से बैठो, अपने आप से मतलब रखो जैसी बाते कह कर चुप करा दिया जाता है ।
सोचिये अगर ये मजनूं नहीं होते तो क्या होता हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों का । उन्हें भी तो देश में गरीबी की समस्या कम और मजनूं की समस्या ज्यादा दिखती है शायद इसी कारण राजनीतिक पार्टियां भी चुनावो की तरह ही वैलेंटाइन ड़े की तैयारी करती है सड़को पर , शाँपिगं माँल में तोड़ फोड.करने वाले बस अपने अन्दर के मजनूं को मारो, सारी समस्या खत्म हो जाएगी ।
प्यार तो बस दो पलो का फसाना है , बाकी सब दोस्ताना है
एक मेरा दोस्त जिसका नाम ?( मासूम मिज़ाज़) है ने कहां अगर आप को किसी में वैलेंटाइन दिख जाए, तो आप ऊपर वाले वैलेंटाइन के बहुत करीब हो जाते है नाचे वाला (चूतिया ) वैलेंटाइन आप को मिले न मिले , उपर बैठा वैलेटाइन आप की सारी इच्छाओ की पूर्ति कर देता है ।
ज़र्रे ज़र्रे में उसी का नूर है .
झांक खुद में वो ना तुझसे दूर है ।।
इश्क है उससे तो खुद से इश्क कर ।
इस इबादत का यही दस्तूर है ।।
इसमें, उसमें और..... उसमें है वो ही ।
प्यार मेरा हर तरफ भर पूर है ।।
अगर आप किसी को अपना वैलेंटाइन मानते है तो ये उम्मीद न रखें की वो भी आप को अपना वैलेंटाइन माने । अगर आप ऐसा सोचते है तो आप मजनूं कभी नहीं कहलाएगें ।

